हरित रोग का इलाज | आयुर्वेद

परिचय-
हरित्-रोग में रोगी स्त्री के शरीर में खून के लाल कण कम हो जाते हैं जिसके कारण उसके शरीर की त्वचा सूखकर पीली या हल्के गंधक के रंग की हो जाती है।

कारण-

हरित्-रोग अक्सर ज्यादा खून बहने के कारण, मासिकधर्म का अनियमित होना, दिमागी परेशानी, रोजाना शारीरिक मेहनत ना करने आदि कारणों से हो जाता है।

लक्षण-

हरित्-रोग के लक्षणों में रोगी को नियमित समय पर मासिकस्राव नहीं होता, शरीर की गर्मी कम हो जाती है, सिर में दर्द रहता है, रोगी को हर समय ठंड सी लगती रहती है, आंखों के चारों ओर काले घेरे से पड़ जाते हैं, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, नाड़ी कमजोर हो जाती है, होंठों का सूख जाना, पेट में कब्ज का होना, बात-बात पर गुस्सा आना, अरुचि आदि हो जाते हैं।

हरित्-रोग में विभिन्न औषधियों का प्रयोग-

1. फेरम-रेडैक्टम – फेरम-रेडैक्टम को हरित्-रोग की एक बहुत ही अच्छी औषधि मानी जाती है। रोगी को इस औषधि की 0.12 ग्राम मात्रा का सेवन कराना चाहिए।

2. ग्रैफाइटिस – रोगी स्त्री को कम मात्रा में मासिकस्राव का आना, त्वचा का रूखा-सूखा होना, पेट में कब्ज होना, गर्भस्राव होना, शरीर का मोटा हो जाना आदि लक्षणों में रोगी स्त्री को ग्रैफाइटिस औषधि की 3x मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।

3. कैल्के-कार्ब- 12 से 13 साल की लड़की को हरित्-रोग होने के बाद स्नायु-शूल, सिर में चारों ओर पसीना आना, पैरों का ठंडा हो जाना, अस्थि-गुल्म (हडि्डयों में फोड़ा हो जाना) जैसे लक्षण पैदा होने पर उसे कैल्के-कार्ब औषधि का सेवन कराना चाहिए। इसके अलावा पुरानी सर्दी या दस्त का रोग, रीढ़ की हड्डी टेढ़ी या कमजोर हो जाना, रोगी स्त्री का धीरे-धीरे मोटापा बढ़ता जाना आदि लक्षणों के आधार पर भी कैल्के-कार्ब औषधि की 3 या 30 शक्ति का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।

4. क्यूप्रम- आयरन से बनी औषधियों के ज्यादा सेवन या गर्म पानी से स्नान करने के कारण हरित्-रोग का बढ़ जाना ऐसे लक्षणों में क्यूप्रम औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

5. फेरम-मेट – हरित्-रोग में रोगी को बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाना, मुंह या होंठों का पीले या खाकी रंग का होना, चक्कर आना, कानों में भौं-भौं की सी आवाजें आना, दिल का तेज धड़कना, सांस लेने में परेशानी पैदा होना, हर समय ठंड सी लगते रहना, मासिकधर्म का रुक जाना ऐसे लक्षणों में फेरम-मेट औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।

6. सिपिया – रोगी के सिर में बहुत तेज दर्द, गर्भाशय के भाग में दर्द, पेट का पिचक जाना, मासिकस्राव का कम आना या मासिकधर्म के बंद होने के बाद मासिकस्राव आना, हरे या पीले रंग का प्रदर (योनि में से पानी आना), पेट में कब्ज बनना जिसके कारण काफी जोर लगाने के बाद भी मल नहीं आता सिर्फ हवा निकलती है, मल का मींगनी की तरह आना, आधे सिर में दर्द होना (माइग्रेन) आदि लक्षणों में रोगी को सिपिया औषधि की 13 शक्ति देने से लाभ मिलता है।

7. बैलेरियाना- स्नायविक उपसर्ग या हिस्टीरिया रोग के साथ हरित्-रोग होने पर रोगी को बैलेरियाना औषधि देनी चाहिए।

8 . आर्जेण्टम-नाइट्रिकम- हरित्-रोग में रोगी को उल्टी होना, पेट में बहुत तेजी से दर्द का उठना, दिल का तेजी से धड़कना, बेहोशी छाना आदि लक्षणों में आर्जेण्टम-नाइट्रिकम औषधि की 6 शक्ति का सेवन करना लाभदायक होता है।

9. आर्सेनिक- हरित्-रोग में रोगी को ज्यादा मात्रा में खून बहना, सूजन आ जाना, आयरन वाली औषधियों का ज्यादा मात्रा में सेवन करना आदि लक्षणों में आर्सेनिक औषधि की 30 शक्ति देनी चाहिए।

10. पल्सेटिला- रोगी स्त्री का मासिकस्राव बंद हो जाना या बहुत ही कम मात्रा में आना, हर समय ठंड सी लगते रहना, हाथ-पैरों का ठंडा पड़ जाना, दिल का तेजी से धड़कना, प्रदर (योनि में से पानी आना) का दूध की तरह सफेद रंग का आना, रोगी स्त्री का गर्म घर में दम सा घुटने लगना और खुली हवा में रहने का मन करना आदि लक्षणों में रोगी स्त्री को पल्सेटिला औषधि की 3x मात्रा या 6 शक्ति देनी चाहिए।

11. सल्फर- रोगी स्त्री के ब्रह्मतालु तथा हाथ-पैरों की तलहत्थी में गर्मी सी महसूस होना, पेट में कब्ज बनना, रात को सोते समय बहुत ज्यादा बेचैनी होना, काफी पुराना प्रदर (योनि में से पानी आना) का रोग हो जाने पर सल्फर औषधि की 30 शक्ति देने से लाभ होता है।

12. नेट्रम-म्यूर- रोगी के उरुदेश के जोड़ में ठंड सी महसूस होना, तलपेट का भारी होना, सूजन, पेट में कब्ज बनना, मासिकधर्म का बंद होना आदि लक्षणों में नेट्रम-म्यूर औषधि की 12x मात्रा का चूर्ण या 30 शक्ति लेना लाभकारी रहता है।

सावधानी-

हरित्-रोग के रोगी या रोगी स्त्री को रोजाना ठंडे पानी से नहाना चाहिए। रोगी को ताजी हवा का सेवन कराना चाहिए। रोगी को भोजन में दूध, पानी, दलिया या चक्की में पिसे आटे की हाथ से बनाई रोटी खिलानी चाहिए

तथा सूरज की किरणों को अपने शरीर पर ग्रहण करना चाहिए। इसके अलावा रोगी को अण्डे के अन्दर का पीला भाग, छोटी मछली, तरकारी, ताजे पके फल, दूध, दही, मठा बहुत ज्यादा मात्रा में पानी पीना चाहिए तथा सारे कपड़े उतारकर पूरे शरीर पर धूप लगने देना चाहिए।

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